Wednesday, 6 March 2013

रामराज्य : ऐसा संभव है या यह महज चापलूसी है ?


राम राज बैठे त्रैलोका।
हरषित भए गए सब सोका।।
बयरु न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप विषमता खोई।।
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा।
सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।
नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी।
सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।
राम राज नभगेस सुनु
सचराचर जग माहिं।
काल कर्म सुभाव गुन कृत
दुख काहुहि नाहिं।।
(रा•च•मा• 7।20।7–8; 21।1¸ 5–6¸ 8; 21)
वाल्मीकि रामायण में भरत जी रामराज्य के विलक्षण प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहते हैं, "राघव! आपके राज्य पर अभिषिक्त हुए एक मास से अधिक समय हो गया। तब से सभी लोग नीरोग दिखाई देते हैं। बूढ़े प्राणियों के पास भी मृत्यु नहीं फटकती है। स्त्रियां बिना कष्ट के प्रसव करती हैं। सभी मनुष्यों के शरीर हृष्ट–पुष्ट दिखाई देते हैं। राजन! पुरवासियों में बड़ा हर्ष छा रहा है। मेघ अमृत के समान जल गिराते हुए समय पर वर्षा करते हैं। हवा ऐसी चलती है कि इसका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है। राजन नगर तथा जनपद के लोग इस पुरी में कहते हैं कि हमारे लिए चिरकाल तक ऐसे ही प्रभावशाली राजा रहें।"

श्रीमद्भगवद्‌गीता

श्रीमद्भगवद्‌गीता हिन्दू धर्म के पवित्रतम ग्रन्थों में से एक है। महाभारत के अनुसार कुरुक्षेत्र युद्ध में श्री कृष्ण ने गीता का सन्देश अर्जुन को सुनाया था। यह महाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत दिया गया एक उपनिषद् है । इसमें एकेश्वरवाद, कर्म योग, ज्ञानयोग, भक्ति योग की बहुत सुन्दर ढंग से चर्चा हुई है। इसमें देह से अतीत आत्मा का निरूपण किया गया है।
श्रीमद्भगवद्‌गीता की पृष्ठभूमि महाभारत का युद्ध है। जिस प्रकार एक सामान्य मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं में उलझकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और उसके पश्चात जीवन के समरांगण से पलायन करने का मन बना लेता है उसी प्रकार अर्जुन जो महाभारत का महानायक है अपने सामने आने वाली समस्याओं से भयभीत होकर जीवन और क्षत्रिय धर्म से निराश हो गया है, अर्जुन की तरह ही हम सभी कभी-कभी अनिश्चय की स्थिति में या तो हताश हो जाते हैं और या फिर अपनी समस्याओं से उद्विग्न होकर कर्तव्य विमुख हो जाते हैं। भारत वर्ष के ऋषियों ने गहन विचार के पश्चात जिस ज्ञान को आत्मसात किया उसे उन्होंने वेदों का नाम दिया। इन्हीं वेदों का अंतिम भाग उपनिषद कहलाता है। मानव जीवन की विशेषता मानव को प्राप्त बौद्धिक शक्ति है और उपनिषदों में निहित ज्ञान मानव की बौद्धिकता की उच्चतम अवस्था तो है ही, अपितु बुद्धि की सीमाओं के परे मनुष्य क्या अनुभव कर सकता है उसकी एक झलक भी दिखा देता है। उसी औपनिषदीय ज्ञान को महर्षि वेदव्यास ने सामान्य जनों के लिए गीता में संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया है। वेदव्यास की महानता ही है, जो कि 11 उपनिषदों के ज्ञान को एक पुस्तक में बाँध सके और मानवता को एक आसान युक्ति से परमात्म ज्ञान का दर्शन करा सके।

गीता पर भाष्य

संस्कृत साहित्य की परम्परा में उन ग्रन्थों को भाष्य (शाब्दिक अर्थ - व्याख्या के योग्य), कहते हैं जो दूसरे ग्रन्थों के अर्थ की वृहद व्याख्या या टीका प्रस्तुत करते हैं। भारतीय दार्शनिक परंपरा में किसी भी नये दर्शन को या किसी दर्शन के नये स्वरूप को जड़ जमाने के लिए जिन तीन ग्रन्थों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना पड़ता था (अर्थात् भाष्य लिखकर) उनमें भगवद्गीता भी एक है (अन्य दो हैं- उपनिषद् तथा ब्रह्मसूत्र)। [1] भगवद्गीता पर लिखे गये प्रमुख भाष्य निम्नानुसार हैं-
  • गीताभाष्य - आदि शंकराचार्य
  • ज्ञानेश्वरी - ज्ञानेश्वर महाराज ने संस्कृत से गीता का मराठी में अनुवाद किया ।
  • श्रीमद् भगवद् गीता यथारूप-प्रभुपाद
  • गीतारहस्य - बालगंगाधर तिलक
  • अनासक्ति योग - महात्मा गांधी
  • (Essays on Gita) - अरविन्द घोष
  • गीताई - विनोबा भावे
  • गीता तत्व विवेचनी - जयदयाल गोयन्दका
  • BhagvadGita As It Is-स्वामी प्रभुपाद (इस्कोन के संस्थापक)
  • बसन्तेश्वरी भगवद्गीता- प्रो बसन्त प्रभात जोशी

 

Wednesday, 16 January 2013

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् ।

हमारे संस्कार :अक्षर आरंभ संस्कार क्यों


लिपि में प्रयुक्त होने वाले अक्षरों से जसि संस्कार का श्रीगणेश किया जाए, उसे अक्षरारम्भ अथवा विद्यारम्भ संस्कार कहते हैं। ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी में महामुनि पाणिनी लिपि का उल्लेख करते हं। भगवान बुद्ध के समय में अनेक लिपियां प्रचलित थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भग्वद्गीता में अक्षरों में आकार को सर्वश्रेष्ठ माना है। महाभारत के लेखन का गुरुभार भगवान श्रीगणेश ने संभाला था। तांत्रिक वांग्मय में अक्षरों की देवता के रूप में पूजा की जाती है। षट्चक्रों के पटल अक्षर ध्वनियों से स्पंदित होते हैं। वेदों का सारभूत ऊं एकाक्षर है।
लिपिज्ञान भारतीय मनीषियों को अति प्राचीन काल से था, किंतु कुछ आधुनिकों के मतानुसार प्राचीन काल में भारतीय लिपिज्ञान से अपरिचित थे। इसकी सम्पिुष्टि में वे वेदों की श्रुति परम्परा को प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत करते हंै। यद्यपि वेदों का अभ्यास गुरुमुख से ही किया जाता था, तथापि लौकिक व्यवहार के निर्वाह हेतु लिपि का निश्चयत: आविर्भाव हो चुका था। शौनकीय और माध्यन्दिन संहिता में तो 'लिख् धातु का अनेक बार प्रयोग किया गया है।
विद्यारम्भ संस्कार का अनुष्ठान चूडाकरण-संस्कार के अनन्तर ही किया जाना चाहिए - 'वृत्तचौलकर्मा लिपिं संख्यानं चोपयुञ्जीत।Ó जन्म से पांचवें वर्ष में इसकी सम्पन्नता को उपयुक्त माना गया है। उपयुक्त देशकाल में किया गया संस्कार बालक के मन पर अमिट प्रभाव छोड़ता है। जिस प्रकार मिट्टी के कच्चे घड़े पर लाल काले रंगों से जो रेखाएं खींच दी जाती हैं वे उसे पकाने पर अमिट हो जाती हैं, उसी प्रकार बालमन पर यथासमय डाला गया संस्कार अमिट हो जाता है। कोमल शाखा को चाहे जिस ओर मोड़ दो, वृक्ष की शाखा के रूप में बढऩे पर भी वह पूर्ववत् मुड़ी रहेगी। किंतु पश्चात उसे दूसरी दिशा में मोडऩा संभव न होगा, प्रयास करने पर वह टूट जाएगी।